अब्दुल्ला आज़म सत्रह महीने से जेल में थे. उन्हें रामपुर ले जाने के लिए समाजवादी पार्टी की साांसद रूचिवीरा भी पहुंची थी. इसी महीने 19 साल पुराने एक केस में आज़म ख़ान के खिलाफ SIT जांच शुरू हो गई है. मामला रंगदारी मांगने का है, लेकिन उनके बेटे अब्दुल्ला को हाल में ज़मानत मिल गई है. ये दोनों घटना संयोग नहीं एक प्रयोग है. वो भी राजनैतिक. सूत्र बताते हैं कि समाजवादी पार्टी से अलग आज़म खान का परिवार राजनैतिक गुना गणित में जुटा है.
कहते हैं कि ताली दोनों हाथ से बजती है. तो खबर है कि आज़म और उनके परिवार के लिए समय अच्छा हो सकता है. शायद कोर्ट कचहरी के चक्कर कम लगाने पड़े. परिवार में इस पर विचार चल रहा है. लंबे समय से आज़म की राजनीति और उनका अली ज़ौहर यूनिवर्सिटी संकट में है. यूपी में योगी सरकार के आते ही आज़म और उनके परिवार पर तो मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा है. बकरी चोरी और डकैती से लेकर ज़मीन क़ब्ज़े करने तक के मुकदमे चल रहे हैं
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एक दौर मैं यूपी की राजनीति में आज़म खान की तूती बोलती थी. मुख्यमंत्री मुलायम हों या फिर अखिलेश यादव, आज़म खान का रुतबा मिनी सीएम वाला ही रहा, लेकिन आज न तो वे चुनाव लड़ सकते हैं न ही उनके बड़े बेटे अब्दुल्ला आज़म. कोर्ट ने दोनों के चुनाव लड़ने पर रोक लगा दी है. एक जमाने में दोनों पिता पुत्र विधायक थे और आज़म की पत्नी तंजीन फ़ातिमा राज्य सभा की सांसद थीं. एक समय में तीनों जेल में बंद थे. समाजवादी पार्टी की राजनीति में भी आज़म और उनका परिवार अब उतना ताकतवर नहीं रहा. उनके धुर विरोधी मोहिबुल्लाह नदवी रामपुर के सांसद हैं. आशु मलिक, कमाल अख़्तर से लेकर जिया उर रहमान बर्क अब पार्टी में प्रभावशाली मुस्लिम नेता बन गए है. अखिलेश यादव के आस पास यही नेता अब नज़र आते हैं.
आज़म खान तो जेल में हैं पर उनके समर्थकों ने अखिलेश यादव के खिलाफ मोर्चा खोल रखा है. बात पिछले साल के 10 दिसंबर की है. रामपुर से समाजवादी पार्टी के जिला अध्यक्ष अजय सागर के लेटरहेड पर आज़म का संदेश जारी हुआ. इंडिया गठबंधन के खिलाफ झंडा बुलंद हुआ. कहा गया कि रामपुर के मामले में सब ख़ामोश रहे, लेकिन संभल के केस में संसद से लेकर सड़क तक विरोध हुआ. आज़म खान को लगता है कि संभल से सांसद जिया उर रहमान बर्क अब अखिलेश की पसंद बन गए हैं.